
हरेला उत्तराखंड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय लोकपर्व है, जो मुख्य रूप से कर्क संक्रांति (श्रावण मास के प्रथम दिन) मनाया जाता है। इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन में प्रवेश करता है। ‘हरेला’ शब्द का अर्थ है “हरियाली का पर्व”, जो प्रकृति, कृषि, नई फसल, समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है।
आज के समय में उत्तराखंड सरकार ने भी इस पर्व को पर्यावरण संरक्षण अभियान से जोड़ते हुए राज्यभर में व्यापक स्तर पर पौधारोपण कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं। हरेला केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है।
🌱 हरेला पर्व की प्रमुख परंपराएँ
1. हरेला बोना
हरेला पर्व से 9 या 11 दिन पूर्व घरों के पूजा स्थल में छोटी टोकरियों (डकरा) में मिट्टी भरकर 5, 7 या 9 प्रकार के अनाज जैसे गेहूँ, जौ, मक्का, सरसों, उड़द आदि बोए जाते हैं। इन टोकरियों को धूप से दूर रखा जाता है, जिससे अंकुर हल्के पीले और हरे रंग के विकसित होते हैं। यह आने वाली अच्छी फसल, समृद्धि और सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है।
2. हरेला काटना एवं पूजन
कर्क संक्रांति के दिन इन अंकुरित पौधों को विधिपूर्वक काटा जाता है। सबसे पहले इन्हें घर के इष्ट देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग सदस्य बच्चों एवं युवाओं के सिर और कानों पर हरेला रखकर उन्हें सुख, समृद्धि, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद देते हैं।
3. पारंपरिक कुमाऊँनी आशीर्वाद
हरेला के अवसर पर बुजुर्ग पारंपरिक कुमाऊँनी भाषा में आशीर्वाद देते हैं—
“जी रया, जागी रया, यो दिन-बार भेटने रया…”
अर्थात् आप दीर्घायु हों, सदैव जागरूक रहें तथा यह शुभ पर्व आपके जीवन में बार-बार आता रहे।
🍽️ हरेला के पारंपरिक व्यंजन
हरेला पर्व पर उत्तराखंड के घरों में शुद्ध घी से बने अनेक पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- पूरी
- पुए
- सिंगल (सूजी एवं केले से बना पारंपरिक मीठा पकवान)
- अन्य स्थानीय पारंपरिक व्यंजन
ये व्यंजन पर्व की खुशी और पारिवारिक एकता का प्रतीक माने जाते हैं।
🕉️ सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व
भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी मान्यता
लोक मान्यताओं के अनुसार सावन माह भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन का प्रतीक है। इस अवसर पर कई स्थानों पर मिट्टी से शिव-पार्वती एवं उनके परिवार की प्रतिमाएँ (डिकारे) बनाकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
अच्छी फसल एवं समृद्धि की कामना
हरेला के अंकुरों की लंबाई, हरियाली और घनत्व को आने वाले कृषि वर्ष का शुभ संकेत माना जाता है। यदि पौधे हरे-भरे एवं लंबे हों, तो इसे अच्छी वर्षा, भरपूर फसल और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
🌍 पर्यावरण संरक्षण का संदेश
हरेला पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश देता है। इस दिन उत्तराखंड में लाखों लोग पौधारोपण करते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति से कम से कम एक पौधा लगाने का आग्रह किया जाता है। लोकमान्यता है कि हरेला के दिन लगाया गया पौधा विशेष रूप से शुभ होता है और उसके संरक्षण से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
✨ हरेला पर्व का संदेश
हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, कृषि, संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का उत्सव है। यह हमें हरियाली बढ़ाने, जल एवं वन संरक्षण करने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ एवं हरित वातावरण बनाने की प्रेरणा देता है।
“एक पौधा लगाएँ, प्रकृति बचाएँ — यही हरेला पर्व का सबसे बड़ा संदेश है।”
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